संतोषजनक और सुखी जीवन जीने का रहस्य। 

संतोषजनक और सुखी जीवन जीने का रहस्य। 

संतोषजनक और सुखी जीवन जीने का रहस्य।

बहुत समय पहले भारतवर्ष के बड़े राज्य में एक शूर वीर राजा राज्य करता  था।

कुछ समय बाद  किसी कारणवश अपने शत्रु से युद्ध होने के बाद वह अपना सिंहासन,  अपनी सेना, अपना राज्य सब कुछ खो चुका था।

और अपनी शत्रु से बचने के लिए वह भागकर जंगल में छुप कर रह रहा था।

वो राजा अपने जीवन में कभी कोई युद्ध हारा नहीं था अतः अपना राज्य खोने के बाद वह पूरी तरीके से टूट गया था।

उसके पास ना तो सेना थी, ना रहने का ठिकाना था, बस कुछ सैनिक थे जो उसके साथ बच गए थे।

संतोषजनक और सुखी जीवन जीने का रहस्य। 

इसी हताशा और निराशा में एक दिन उस जंगल में उसकी मुलाकात एक संत से हुई।

संत बहुत ज्ञानी थे इसलिए राजा ने उनसे अपनी मन की चिंता व्यक्त की।

राजा को आशा थी कि वह संत उसकी समस्या का जरूर कोई ना कोई समाधान निकाल देंगे।

राजा ने पूछा,

‘ हे महाराज, मैं इस मुसीबत की घड़ी में, जब मैंने सब कुछ खो दिया है तो मैं खुशी से एक सार्थक जीवन कैसे जी सकता हूं? संतोषजनक और सुखी जीवन जीने का रहस्य क्या है?

’संत में मुस्कुराते हुए राजन से पूछा,

‘राजन मैं इस बात का उत्तर अवश्य दूंगा। पहले आप मेरे प्रश्न का उत्तर दें कि आपके पास कितनी आंखें हैं?’

राजा इस प्रकार के सरल और मूर्खतापूर्ण प्रश्न के लिए तैयार नहीं था।

मन ही मन उसे बहुत क्रोध आया।

इस प्रकार का प्रश्न अगर किसी ने पहले पूछने की हिम्मत की होती तो राजा शायद उसका सर ही कटवा दिता। लेकिन अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए उसने धीरे से उत्तर दिया,

‘ महाराज मेरी दो आंखें हैं।

शांति से मुस्कुराते हुए संत ने राजा से कहा,

‘ राजन , मैं तुम्हें कल सुबह एक अलग दुनिया दिखाऊंगा।’

और वह वापस अपने आश्रम में चला गया।

अगले दिन सुबह, राजा संत के सामने अपनी आँखें बंद किए बैठा था।

वह असमंजस में था कि आज संत उसे क्या ज्ञान देने वाले हैं जिससे उसकी समस्या का हल हो जाए।

और कल वाले प्रश्न को याद करते हुए सोच रहा था कि इस प्रश्न का उसकी समस्या के साथ क्या सामंजस है?

संत ने उत्तर दिया एक व्यक्ति सामान्यता अपनी दोनों आंखों के माध्यम से दुनिया को देखता है और उसी को सत्य मानता है।

जीवन भर वह सांसारिक वस्तुओं में  ही अपनी खुशियां, संतोष और प्यार की तलाश करता है।

इसलिए जब उन सांसारिक वस्तुओं को खो देता है तो वह अंदर से खोखला और उदास महसूस करता है।

राजा को संबोधित करते हुए संत ने कहा,

राजन हमारे पास कितनी आंखें हैं उसका जवाब है, हमारी तीन आंखें हैं।

हम दो आंखों से देखते हैं लेकिन तीसरी आंख जो हमें दिखाई नहीं पड़ती उसे हम विवेक कहते हैं।

हम उसका इस्तेमाल जीवन पर्यंत करते हैं, जो सभी के पास पहले से ही है, लेकिन उसके बारे में पता नहीं है।

बुद्धि के माध्यम से, हम अपने सच्चे स्वरूप को देख सकते हैं जो ऊर्जा, खुशी, आत्म-गौरव और स्नेह से भरा है।

एक व्यक्ति जो महसूस करता है कि उसने सब कुछ खो दिया है, वास्तव में वो सांसारिक सुख हैं, जैसे हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा, दूसरों के साथ हमारे संबंध, हमारी सांसारिक संपत्ति, हमारी शारीरिक शक्ति।

ये वो चीजें हैं जो हम बाहरी आंखों से देखते हैं।

ये सभी संपत्ति स्थायी नहीं हैं, इसलिए वे आती जाती रहती हैं।

इसलिए हम अपनी स्थायी खुशी के लिए उन पर भरोसा नहीं कर सकते।

अगर ज्ञान की बात करें तो तीसरी आंख के माध्यम से अंदर की ओर देखते हुए, आप जो कुछ भी खो चुके हैं उससे लड़ने और फिर से हासिल करने की ताकत पाएंगे।

आप पाएंगे कि आपकी खुशी आपके पास, आपके स्वयं, आपके कौशल, अच्छी यादों, जो हमें जीवित रहने के लिए आवश्यक सभी चीजे प्रकृति मां निहित प्रदान करती है।

ये चीजें आपके अंदर स्थायी हैं। कोई भी आपको कभी भी इनसे दूर नहीं कर सकता है।

आप जो वापस पाना चाहते हैं उसे पाने के लिए इन शक्तियों का उपयोग करें।

आपके खोए हुए शासन, स्थिति, धन और रिश्तों को उन आंतरिक शक्तियों द्वारा जीता जा सकता है। उन्हें पहचानिए! ‘

संतोषजनक और सुखी जीवन जीने का रहस्य। 

राजा को उसका जवाब मिल गया।

राजा ने अपने विवेक से काम लिया और अपने साथियों को बड़े उत्साह के साथ फिर से खड़ा किया।

वह फिर से लड़े और अपने खोए हुए राज्य को वापस पा लिया और एक आनंदमय और खुशहाल जीवन जीया।

ये है संतोषजनक और सुखी जीवन जीने का रहस्य। 

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