Ajita Chapter-2 समझौता

Ajita Chapter-2 समझौता

समझौता

बारहवीं की परीक्षा खत्म होते ही अजिता के पिताजी उसकी शादी ढूँढने लगे।

अजिता ने पहले बहुत मना किया।

वह एक अच्छी छा़त्रा थी और उसने अपने करियर के कुछ सपने देखे थे।

उसे उस समय शादी करने का मन नहीं था।

लेकिन फिर अजिता की माँ ने उसे समझाया कि उसकी शादी ऐसी जगह करेंगे जहाँ उसकी पढ़ाई चलती रहे।

आखिरकार अजिता शादी के लिए मान गई क्योंकि पिताजी बिमार रहते थे और वह जल्द ही अपनी जिम्मेदारी पूरी कर देना चाहते थे।

अजिता को केवल इस बात की तसल्ली थी कि उसकी पढ़ाई जारी रहेगी, अजिता के पति विजय एक पढ़े लिखे सभ्य इंसान थे।

उन्हें अजिता की पढ़ाई जारी रखने से कोई एतराज नहीं था।

उसके लिए शादी गुड्डे-गुड़ियों के खेल से ज्यादा कुछ नहीं था, इसलिए वह जब विदा हो रही थी तो उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसके घर वाले क्यों रो रहे हैं, जबकि उसके पति का घर तो पास में ही था।

बड़े भोलेपन में माँ के पास जाकर बोली,“आप लोग इतना रो क्यों रहें हैं???

हम पास ही में तो रहेंगें। आप लोग चुप हो जाइए नहीं तो हमें भी रोना आ जाएगा।”

अपनी भेाली मासूम बेटी को गले लगाकर माँ बोली,

“मेरी प्यारी बच्ची, तुम हमेशा खुश रहना। जाओ, खुशी खुशी जाओ अब हम नहीं रोएँगे”

यह कहकर उन्होनें साड़ी के पल्लू से अपने आँसू पोछें और अपनी बेटी के सर पर हाथ रख दिया।

“अम्मा, मैं जा रही हूँ, आप पिताजी का ध्यान रखना,” और यह कहकर अपने सपनों को साथ में लिए उसने उस घर की दहलीज की तरफ अपने कदम बढ़ाए जहाँ चले हुए हर कदम का हिसाब देना पड़ता है।

लेकिन वह इन सबसे अनजान अपनी ही दुनिया में मस्त थी। उसे न तो माँ-बाप से दूर जाने का एहसास था और न ही अनजान परिवार में अनजान लोगों के साथ रहने की कोई फिक्र थी।

उसे तो सब लोगों की इस बात पर विश्वास था कि “लड़की का ससुराल ही उसका अपना घर होता है और वहाँ के लोग उसके अपने होते हैं।”

तो इसलिए उसे परेशान होने की क्या जरुरत थी।

जहाँ वह जा रही थी वहाँ तो सब उसके अपने लोग ही होगें।

उसके भाग्य में क्या लिखा था उसकी उसे चिंता नहीं थी।

*******

दो महीने के बाद-

“बहू अपने मायके जाने की जिद्द कर रही है।”

“नहीं, अभी कैसे भेज सकते हैं। आप उससे बता क्यों नहीं देती कि अभी दिन शुभ नहीं चल रहे हैं। कम से कम दो महीने तक नहीं भेज सकते।”

“बताया था, लेकिन उसे यह बात समझ में नहीं आ रही।

उसके मायके वाले भी बार-बार भेजने पर जोर दे रहे हैं।“

“आप उन लोगों को कह दीजिये कि बार-बार न आयें।

बहू को तभी भेजेंगे जब समय सही होगा।”

“सब कहा था लेकिन उनका कहना है कि बहू के पिताजी की तबियत ठीक नहीं है इसलिए वह अजिता को देखना चाहते हैं।

अजिता भी अपने पिताजी से मिलने को व्याकुल हो रही है।

“आप बहू को गाँव ले जाइये, यहाँ से दूर चली जाएगी तो उसका मन भी बदल जाएगा और वहाँ सबसे मुलाकात भी हो जाएगी।

यहाँ रहेगी तो परेशान ही रहेगी क्योंकि दो महीने से पहले भेजना ठीक नहीं रहेगा।”

“बात तो ठीक है लेकिन विजय को इतने दिनों की छुट्टियाँ नहीं मिल पाएगी।”

“विजय यहीं रहेगा। आप अजिता को लेकर चले जाइए। विजय को मैं समझा दूँगा और जब उसकी छुट्टी मिल जायेगी तो वह भी वहाँ आ जाएगा।”

“ठीक है भईया, जैसा तुम ठीक समझो।”

अजिता के ससुर नहीं थे इसलिए उसकी सास अपने देवर से पूछ कर ही कोई निर्णय करती थी।

अजिता को जब गाँव जाने की बात पता चली तो वह पहले परेशान हो गई लेकिन फिर उसे लगा इस बहाने उसे गाँव देखने का मौका मिलेगा।

इसलिए बाद में वह खुशी से वहाँ जाने को तैयार हो गई।

 

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